रामायण की मर्मस्पर्शी घटनाओं में से एक, राजा दशरथ का देहावसान, आज भी हर राम भक्त की आंखों को नम कर देता है। इस प्रसंग का वर्णन करते हुए, प्रख्यात राम-कथा वाचक श्री राज महाजन ने इस हृदयविदारक क्षण को इतनी आत्मीयता से प्रस्तुत किया कि श्रोताओं की आंखें छलक उठीं। दशरथ का जीवन केवल एक राजा का जीवन नहीं था, बल्कि वह पिता, प्रेम और त्याग का सजीव उदाहरण थे, जिनकी मृत्यु पुत्र वियोग का परिणाम बनी।
राजा दशरथ: न्यायप्रिय राजा, स्नेही पिता
अयोध्या के राजा दशरथ अपने चारों पुत्रों – राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के प्रति समर्पित पिता थे। उनका हृदय पुत्रों के प्रति अपार स्नेह से भरा हुआ था। श्री राज महाजन ने कथा में बताया कि जब श्री राम के वनवास का निर्णय हुआ, तो दशरथ का हृदय इस वियोग को सहन नहीं कर सका। उन्होंने अपने वचन की मर्यादा निभाने के लिए राम को वनवास भेजा, लेकिन इस निर्णय ने उनके जीवन का सबसे बड़ा दुख बनकर उन्हें तोड़ दिया।
वनवास का दर्द: पिता के हृदय को झकझोरने वाला क्षण
श्री राम को 14 वर्षों के लिए वनवास भेजना, दशरथ के लिए आत्मा को छलनी कर देने वाला क्षण था। श्री राज महाजन ने इस प्रसंग को भावुक अंदाज में सुनाया, जहां दशरथ की वेदना सुनकर श्रोता भावविभोर हो उठे। दशरथ का हृदय राम के वियोग में धीरे-धीरे टूटने लगा। उन्होंने बार-बार राम को पुकारा, लेकिन उनके प्रिय पुत्र के दर्शन की लालसा अधूरी ही रह गई।
श्रवण कुमार की कथा: दशरथ का अंतर्निहित दर्द
इस मार्मिक प्रसंग में श्री राज महाजन ने श्रवण कुमार की कथा का उल्लेख भी किया। दशरथ के जीवन में यह प्रसंग एक गहरी छाप छोड़ गया था। श्रवण कुमार की हत्या अनजाने में दशरथ से हो गई थी, जिसके कारण श्रवण के अंधे माता-पिता ने उन्हें पुत्र वियोग का श्राप दिया था। दशरथ ने इस श्राप को अपने जीवन के अंतिम क्षणों में साकार होते देखा, जब राम के वियोग में उनका हृदय छटपटा उठा।
Video Link : https://youtu.be/C7nEHWvk4dQ
कौशल्या का धैर्य: संबल का संदेश
जब कौशल्या ने अपने पति दशरथ को टूटते देखा, तो उन्होंने धैर्य और संयम का संदेश दिया। श्री राज महाजन ने बताया कि कौशल्या ने दशरथ को समझाया कि यदि हम अपने पुत्र के वियोग में डूब जाएंगे, तो अयोध्या की खुशियां भी बुझ जाएंगी। कौशल्या ने अपने धैर्य से दशरथ को सहारा देने का प्रयास किया, लेकिन उनका दुख इतना गहरा था कि वह जीवन को त्यागने पर मजबूर हो गए।
दशरथ का देहावसान: राम नाम का अंतिम स्मरण
श्री राज महाजन ने इस भावुक क्षण को विस्तार से सुनाया कि जब दशरथ ने अपने प्राण छोड़े, तो उनके मुख से अंतिम बार “राम” का ही नाम निकला। पुत्र वियोग की इस वेदना ने दशरथ को भीतर से इतना तोड़ दिया कि वह राम का स्मरण करते हुए स्वर्ग सिधार गए।
अयोध्या में शोक की लहर
दशरथ के निधन की खबर से अयोध्या में शोक की लहर दौड़ गई। रानियां, दास-दासी और समस्त प्रजा विलाप करने लगी। दशरथ के निधन के समय उनके चारों पुत्र उनके पास नहीं थे, यह पीड़ा अयोध्या के हर निवासी के दिल को छू गई।
त्याग और प्रेम की अमर कहानी
श्री राज महाजन ने इस कथा के माध्यम से समझाया कि दशरथ की मृत्यु केवल एक राजा का अंत नहीं थी, बल्कि यह त्याग, प्रेम और कर्तव्य का संदेश था। दशरथ का जीवन यह सिखाता है कि प्रेम और समर्पण में कितनी शक्ति होती है और किस प्रकार एक पिता अपने वचन और धर्म के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे देता है।
श्री राज महाजन का संदेश: जीवन में कर्तव्य और त्याग की सीख
राम-कथा के इस प्रसंग को प्रस्तुत करते हुए श्री राज महाजन ने श्रोताओं को जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझने की प्रेरणा दी। दशरथ की कथा प्रेम, त्याग और कर्तव्य की मिसाल है, जो हर युग में हमें सच्ची भक्ति और समर्पण का मार्ग दिखाती रहेगी।
अंत में: दशरथ की कथा का संदेश
राजा दशरथ की मरण कथा केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं है, बल्कि यह मानवता के लिए प्रेम, कर्तव्य और त्याग का अमर संदेश है। श्री राज महाजन द्वारा प्रस्तुत राम-कथा का यह प्रसंग श्रोताओं के हृदय में गहरी छाप छोड़ गया, जो हमें सिखाता है कि जीवन में प्रेम और त्याग ही सबसे बड़ी शक्ति हैं।
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