मशहूर कॉमेडियन राजपाल यादव को पुराने चेक बाउंस मामले में तिहाड़ जेल जाना पड़ा. सवाल सीधा है कि क्या 9 करोड़ रुपये जमा कर देने से जेल से राहत मिल सकती है? इस केस में अब लोग यह जानना चाहते हैं कि चेक बाउंस कानून क्या कहता है और जेल जाने के बाद भी क्या पैसा चुकाना जरूरी रहता है?
यह कहानी साल 2010 से शुरू होती है. राजपाल यादव अपनी फिल्म ‘अता पता लापता’ बनाना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने दिल्ली की एक कंपनी मुरली प्रोजेक्ट्स से करीब 5 करोड़ रुपये का कर्ज लिया था. फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली और आर्थिक परेशानी बढ़ती गई.
कर्ज चुकाने के लिए दिए गए चेक बैंक में बाउंस हो गए. यहीं से मामला अदालत तक पहुंचा. ब्याज और जुर्माने के साथ यह रकम बढ़कर करीब 9 करोड़ रुपये तक पहुंच गई. निचली अदालत ने उन्हें छह महीने की सजा सुनाई है. दिल्ली हाईकोर्ट ने कई बार मौका दिया कि वे रकम चुका दें, लेकिन भुगतान नहीं होने पर सख्त रुख अपनाया गया और उन्होंने तिहाड़ जेल में आत्मसमर्पण करना पड़ा।
कानूनी जानकारों के मुताबिक, अगर आरोपी शिकायतकर्ता से समझौता कर ले और बकाया रकम चुका दे, तो वह अदालत से सजा में राहत की मांग कर सकता है. इसे आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट कहा जाता है.
अगर राजपाल यादव पूरी रकम या तय समझौता राशि चुका देते हैं, तो वे सजा कम करने या खत्म करने के लिए उच्च अदालत में अपील कर सकते हैं, लेकिन जब तक भुगतान नहीं होता, अदालत का आदेश लागू रहेगा.
अगर भुगतान नहीं किया जाता, तो छह महीने की पूरी सजा काटनी होगी. अच्छे आचरण के आधार पर जेल प्रशासन कुछ दिनों की रियायत दे सकता है, लेकिन यह नियमों पर निर्भर करता है। जब कोई व्यक्ति किसी को भुगतान के लिए चेक देता है और बैंक उसे ‘अपर्याप्त धनराशि’ या अन्य वजह से लौटा देता है, तो इसे चेक बाउंस कहा जाता है. नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत यह अपराध माना जाता है. चेक बाउंस होने के बाद, पैसे पाने वाले को 30 दिनों के भीतर कानूनी नोटिस भेजना होता है. नोटिस मिलने के बाद चेक देने वाले के पास रकम चुकाने के लिए 15 दिन का समय होता है।
अगर 15 दिन में भुगतान नहीं होता है, तो मामला अदालत में जा सकता है. दोषी पाए जाने पर दो साल तक की जेल, चेक की राशि का दोगुना जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।यहीं सबसे बड़ी गलतफहमी होती है. जेल की सजा अपराध की सजा होती है, कर्ज की भरपाई के लिए नहीं. सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में साफ कहा गया है कि सजा काट लेने से देनदारी खत्म नहीं हो जाती है।
अगर कोई व्यक्ति जेल से बाहर आ जाता है और फिर भी पैसा नहीं चुकाता है, तो अदालत उसकी संपत्ति कुर्क करने का आदेश दे सकती है. यानी जेल जाना कर्ज से मुक्ति का रास्ता नहीं है।
चेक बाउंस होने पर बैंक हर बार डिसऑनर चार्ज लगाता है, जो आम तौर पर 250 से 750 रुपये तक हो सकता है. अगर चेक EMI, किराया या क्रेडिट कार्ड भुगतान से जुड़ा है, तो संबंधित संस्था लेट फीस, बाउंस फीस और ब्याज भी जोड़ सकती है।
एक से ज्यादा बार चेक फेल होने पर कानूनी कार्रवाई से पहले ही हजारों रुपये अतिरिक्त चार्ज के रूप में देने पड़ सकते हैं।
राजपाल यादव के सामने अब साफ रास्ते हैं, या तो वे रकम चुका कर समझौता करें और अदालत से राहत मांगें, या फिर पूरी सजा काटें और बाद में भी देनदारी का सामना करें।
कानून का नियम साफ है कि चेक देना एक कानूनी वादा है. अगर खाते में पैसे नहीं हैं और भुगतान नहीं होता है, तो यह सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि आपराधिक मामला बन सकता है।