सुप्रीम कोर्ट ने 28 जनवरी 2026 को वक्फ विवादों से संबंधित एक ऐतिहासिक और दिशानिर्देशात्मक फैसला सुनाया है जिसमें उसने वक्फ ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को बिलकुल साफ़ तौर पर सीमित करते हुए यह फैसला लिया कि ट्रिब्यूनल अब सिर्फ उन्हीं मामलों को देख सकता है जो कानून के अंतर्गत आधिकारिक ‘List of Auqaf’ या पंजीकृत वक्फ संपत्तियों से जुड़े हैं।
जिन संपत्तियों को वक्फ एक्ट के अंतर्गत अब तक रजिस्टर्ड या सूचीबद्ध नहीं किया गया है, उन पर ट्रिब्यूनल का कोई अब कोई भी अधिकार नहीं माना जाएगा।
इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ़ कर दिया है कि वक्फ एक्ट की धारा 85 के अंतर्गत सिविल कोर्टों का अधिकार स्वतः समाप्त नहीं होता, यानी यदि संपत्ति को वक्फ के रूप में पंजीकृत नहीं किया गया, तो व्यक्ति सीधा सिविल कोर्ट में मुक़दमा दायर कर सकता है, न कि वक्फ ट्रिब्यूनल में।
भारत में वक्फ संपत्तियों के विवाद हमेशा से ही ट्रिब्यूनल, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचते हैं। देखा जाए तो… परंपरागत रूप से वक्फ ट्रिब्यूनल को विवादों का आखिरी समाधानकर्ता माना जाता रहा है, विशेषकर उन मामलों में जहां संपत्तियों को ‘वक्फ’ घोषित किया जा चुका होता है।
हालाँकि, कई विवादों में लोग “वक्फ-बाय-यूज़र” (waqf by user) का दावा करते हुए ट्रिब्यूनल में प्रॉपर्टी विवाद पेश कर देते हैं, यानी वह कहते हैं कि “हमने इस स्थान पर नमाज़ या धार्मिक प्रयोग लंबे वक़्त तक किया है, इसलिए यह वक्फ की तरह माना जाए।” इसके कारण बहुत सी जमीन या संपत्तियों के मामले ट्रिब्यूनल तक पहुँच जाते हैं।
– ट्रिब्यूनल का न्यायिक अधिकार अब सिर्फ उन्हीं संपत्तियों पर सीमित है जो आधिकारिक रूप से वक्फ सूची में हैं।
– जिन संपत्तियों का पंजीकरण नहीं हुआ है या वे सूची में शामिल नहीं हैं, उनके मामलों को सीधा सिविल कोर्ट में दायर किया जा सकता है।
– यह नियम वक्फ ट्रिब्यूनल को सामान्य कोर्ट से बड़ा शक्ति प्रदान नहीं करेगा, साधारण तौर पर सिविल कोर्ट का रास्ता हमेशा खुला रहेगा।