किसानों-मजदूरों और छात्रों के प्रति समर्पण का नाम: एस एस रूहेला

के. पी. मलिक

राजस्थान के सीकर जिले की लक्ष्मणगढ़ तहसील के छोटे से गांव बैरास-बासनी में 15 मार्च 1941 को एक साधारण किसान परिवार में चौधरी शिवलाल सिंह रुहेला का जन्म हुआ। ग्रामीण परिवेश में पलने-बढ़ने के बावजूद उन्होंने बचपन से ही शिक्षा पर अटूट लगाव दिखाया। सीमित संसाधनों के बीच भी उन्होंने अपनी प्रतिभा से सबको चकित कर दिया। मात्र 19 वर्ष की आयु में 1960 तक भूविज्ञान (एमएससी) की डिग्री प्राप्त कर ली, जो उस दौर में असाधारण उपलब्धि थी। यह शिक्षा ही उनके जीवन का आधार बनी, जिसने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर सेवा के द्वार खोल दिए।

उनकी ओएनजीसी से आईआरएस तक की यात्रा मिल का पत्थर साबित हुई। अपनी शिक्षा पूरी करते ही शिवलाल ने 1960 में ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ओएनजीसी) में प्रवेश किया, जहां उन्होंने अपनी तकनीकी विशेषज्ञता से पहचान बनाई। लेकिन उनका जुनून इससे आगे था। 24 वर्ष की आयु में 1965 बैच में भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) में चयनित होकर उन्होंने कर प्रशासन के क्षेत्र में कदम रखा। उनकी पहली पोस्टिंग जोधपुर में हुई, उसके बाद बीकानेर, भीलवाड़ा, उदयपुर, कोटा, इंदौर, जयपुर और नई दिल्ली जैसे महत्वपूर्ण केंद्रों पर सेवा दी। अंतिम पद आयकर आयुक्त, जोधपुर रेंज रहा। कार्यालय में वे पूर्ण निष्ठा से डटे रहे, कभी समझौता न करते हुए, कर्तव्य को सर्वोपरि रखा। उनकी मेहनत ने उन्हें ‘एसएस रुहेला’ के नाम से अमर कर दिया।

लोग एस एस रूहेला को सादगी और आध्यात्मिक गहराई वाला तपस्वी अधिकारी मानते हैं उनका व्यक्तित्व उनकी सादगी में झलकता था। चाहे सर्दी की ठंड हो या गर्मी की तपिश, उनकी पहचान आधी बांह की सादा शर्ट थी जो उनके त्याग, तप और सहजता का प्रतीक बनी। वे कभी अधिकारी के अहंकारी रूप में न दिखे; सहकर्मियों, अधीनस्थों और आम लोगों से आत्मीय व्यवहार किया। 1987 में आयकर विभाग में आए एक सहकर्मी को चार वर्ष तक उनके साथ काम करने का सौभाग्य मिला, जो आज भी उनकी स्मृति को जीवंत रखता है। उनकी गहराई शिव की समाधि जैसी थी, नवधा भक्ति के नवम सोपान “नवम सरल सब सन छलहीना” पर विराजमान। जटिलताएं और दिखावा उनके जीवन से कोसों दूर थे; वे सिद्ध करते थे कि सच्चा महामानव सामान्य व्यक्ति ही बन सकता है।

अपने पद के साथ‑साथ शिवलाल जी समाज के हाशिए पर रहने वालों के मसीहा बने। गांव-गांव जाकर किसानों व मजदूरों की सरकारी भर्तियों में मदद की, आर्थिक संकट में फंसे छात्रों को चिर-परिचितों से सहायता दिलवाई। ग्रामीण बच्चों को शिक्षा से जोड़ा, सरकारी व निजी नौकरियों में मार्गदर्शन दिया। किसान परिवार से होने के कारण वे खासतौर पर किसानों के बच्चों को पढ़ाई व प्रगति के लिए प्रेरित करते रहे। समय के साथ उन्होंने इन्हें राजनीति, व्यापार व अन्य क्षेत्रों में आगे बढ़ने के लिए तैयार किया, ताकि वे सिर्फ मजदूर न रहें, बल्कि नेता बनें। इस संघर्ष ने उन्हें गरीबों, युवाओं और ग्रामीणों के बीच पूजनीय बना दिया।

उनकी विरासत और समय से पहले विदाई बड़ी दुखदायी तो रही लेकिन उनका जीवन सादगीपूर्ण रहा, धन-दौलत से परे, समाजसेवा ही उनका ध्येय रहा। लेकिन नियति ने उन्हें मात्र 50 वर्ष की आयु में 13 जुलाई 1991 को हमसे छीन लिया। आयकर विभाग ने एक निष्ठावान आयुक्त खोया, तो समाज ने एक सच्चे मार्गदर्शक को। जयपुर के इनकम टैक्स कॉलोनी में निवास करने वाले इस योद्धा की स्मृति आज भी प्रेरणा स्रोत है। ऐसी शख्सियत दुर्लभ होती है, सामान्य जन्म, असाधारण कर्म। उनकी कहानी बताती है कि सच्ची महानता पद में नहीं, चरित्र और सेवा में बसती है।

(लेखक ‘दैनिक भास्कर’ के राजनैतिक संपादक है)

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