विक्रम गोस्वामी
नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली के भीड़भाड़ वाले और व्यावसायिक गतिविधियों से भरे इलाक़े पहाड़गंज स्थित 4196, गली भगवती भवन, तेल मंडी, पहाड़गंज, नई दिल्ली–110055 को लेकर तीस हजारी अदालत ने एक बड़ा और प्रभावी आदेश जारी किया है। यह मामला CASE CS DJ No. 575/25 – Dimple Arora vs Mukesh Kumar & Others शीर्षक से अदालत में विचाराधीन है। सुनवाई के दौरान माननीय अदालत ने भवन पर यथास्थिति बनाए रखने (स्टे) का निर्देश जारी किया है, जिसके बाद इस संपत्ति पर किसी भी प्रकार का लेन–देन, गतिविधि या निर्माण पूर्णतः प्रतिबंधित हो गया है।
अदालत के आदेश के अनुसार, जब तक मुकदमे का अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक इस भवन को न तो किराए पर दिया जा सकता है, न इसकी खरीद–फरोख़्त की जा सकती है, न इसे किसी प्रकार की लीज़ पर दिया जा सकता है, और न ही किसी तरह का निर्माण कार्य किया जा सकता है। अदालत ने आदेश देते समय यह भी स्पष्ट किया कि इन निषेधों का उल्लंघन सीधे अदालत की अवमानना माना जाएगा और उल्लंघन करने वाले के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
पहाड़गंज का यह इलाका हमेशा से व्यावसायिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ बड़ी संख्या में होटल, लॉज, दुकानें, गोदाम और किरायेदारी पर चल रहे व्यवसाय मौजूद हैं। ऐसे में इस प्रकार के आदेश का प्रभाव स्थानीय निवासियों, व्यापारियों और संभावित खरीदारों पर सीधा पड़ता है। यही वजह है कि अदालत के निर्देशों के बाद याचिकाकर्ता डिंपल अरोड़ा ने सार्वजनिक रूप से लोगों को सचेत करते हुए कहा है कि वे इस भवन से जुड़ी किसी भी वित्तीय या कानूनी गतिविधि में शामिल न हों।
मामला इस समय अदालत में लंबित है और अदालत ने दिल्ली नगर निगम (MCD) को भी नोटिस जारी कर तलब किया जा रहा है। MCD की मौजूदगी यह संकेत देती है कि भवन से जुड़े निर्माण, नक्शा स्वीकृति, संरचना या कर संबंधी कुछ पहलुओं पर अदालत विशेष रूप से विचार करना चाहती है। न्यायालय प्रायः ऐसे मामलों में संबंधित नगर निगम से यह जानकारी मांगता है कि भवन का निर्माण वैध है या नहीं, नक्शा अनुमोदित है या अनधिकृत निर्माण हुआ है, और क्या भवन की स्थिति किसी सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ी चिंता उत्पन्न करती है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, भवन से जुड़े स्वामित्व एवं निर्माण संबंधी कई अनियमितताएँ मामले का मूल कारण हैं। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया है कि भवन की स्थिति स्पष्ट होने तक इसे किसी भी प्रकार की व्यावसायिक या निजी गतिविधि के लिए उपयोग न करने दिया जाए। अदालत ने याचिकाकर्ता की मांग पर ध्यान देते हुए तुरंत प्रभाव से स्टे जारी किया, जिससे किसी भी पक्ष द्वारा संपत्ति में परिवर्तन, कब्ज़ा परिवर्तन, लेन–देन या किरायेदारी संबंधी गतिविधि रोकी जा सके।
अदालत के आदेश के बाद अब यह भवन कानूनी रूप से ‘संरक्षित स्थिति’ में आ गया है, जिसका अर्थ है कि वर्तमान स्थिति जैसे है—वैसी ही रहेगी। न कोई नया किरायेदार आ सकता है, न कोई मौजूदा व्यवस्थापन में बदलाव किया जा सकता है। इसी प्रकार किसी भी प्रकार की रजिस्ट्रेशन, एग्रीमेंट टू सेल, अथवा मौखिक व लिखित लेन–देन पर भी रोक प्रभावी रहेगी।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पहाड़गंज जैसे क्षेत्र में संपत्तियों से जुड़े विवाद असामान्य नहीं हैं। घनी आबादी, व्यावसायिक दवाब और पुराने ढांचे के चलते यहाँ स्वामित्व और निर्माण से जुड़े विवाद अक्सर उत्पन्न होते हैं। ऐसे में अदालत के स्पष्ट निर्देश जनता के लिए महत्वपूर्ण हैं, ताकि वे किसी अनावश्यक विवाद, धोखाधड़ी या कानूनी परेशानी से बच सकें।
याचिकाकर्ता डिंपल अरोड़ा ने अंत में अपील की है कि आम नागरिक, खरीदार, दलाल, संपत्ति एजेंट और स्थानीय व्यापारी इस भवन से जुड़ी किसी भी गतिविधि से दूर रहें, क्योंकि मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है और स्टे आदेश पूरी तरह प्रभावी है।