विक्रम गोस्वामी
नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के पहाड़गंज इलाके से एक बार फिर ऐसा मामला सामने आया है जिसने न केवल कानून व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि धार्मिक भावनाओं को भी गहरा आघात पहुंचाया है। प्रॉपर्टी संख्या 8952, गली नंबर 1, मुल्तानी ढांढा, पहाड़गंज में एक मंदिर को ध्वस्त कर उसकी जगह पांच मंज़िला अवैध फ्लैट खड़े कर दिए गए हैं। इस निर्माण में न तो नगर निगम की अनुमति ली गई और न ही किसी धार्मिक न्यास या विभाग की सहमति। इसके बावजूद यह सब कुछ खुलेआम हुआ और आज वहां व्यावसायिक उपयोग के लिए फ्लैट किराए पर चढ़ाए जा रहे हैं।
इस पूरी घटना से कई अहम और गंभीर सवाल उठते हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह कि जब एक धार्मिक स्थल को तोड़ा गया, तब स्थानीय प्रशासन और निगम की मशीनरी कहां थी? क्या मंदिर जैसा सार्वजनिक स्थल एक रात में गिरा दिया गया और निगम को खबर तक नहीं लगी? या फिर यह सब कुछ निगम की मूक सहमति और मिलीभगत से हुआ?
स्थानीय लोगों ने बताया कि वर्षों से वहां एक छोटा मंदिर था जहाँ रोज़ाना पूजा-पाठ होता था। कुछ समय पहले उस स्थल को धीरे-धीरे चारदीवारी से घेरा गया और रातोंरात मंदिर को गिरा दिया गया। उसके बाद तेज़ी से निर्माण कार्य शुरू हुआ और देखते ही देखते वहां पांच मंज़िला इमारत खड़ी हो गई। यह काम न सिर्फ कानून की धज्जियां उड़ाता है बल्कि यह धार्मिक भावनाओं का भी अपमान है।
दिल्ली में अवैध निर्माण की घटनाएं कोई नई नहीं हैं। लेकिन जब कोई धार्मिक स्थल भी इस अंधाधुंध निर्माण और बिल्डरों की लालच का शिकार बन जाए, तो यह दर्शाता है कि हमारी व्यवस्था कितनी लचर और भ्रष्ट हो चुकी है। क्या अब आस्था के स्थान भी संपत्ति में तब्दील कर दिए जाएंगे और प्रशासन केवल तमाशबीन बना रहेगा?
नगर निगम का यह दावा कि उन्हें इस निर्माण की जानकारी नहीं थी, किसी मज़ाक से कम नहीं लगता। दिल्ली में एक आम नागरिक अगर अपनी छत पर टीन शेड भी लगाता है तो निगम का नोटिस उसके घर पहुंच जाता है। ऐसे में पांच मंज़िला अवैध इमारत खड़ी हो जाती है और निगम अनजान बना रहता है — यह बात किसी भी सूरत में पचने वाली नहीं है।
यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि बिल्डर और कुछ भ्रष्ट अधिकारी मिलकर दिल्ली की भूमि और आस्था दोनों की नीलामी कर रहे हैं। जिन अधिकारियों की यह जिम्मेदारी थी कि वे अवैध निर्माण पर रोक लगाएं, वही लोग या तो जानबूझकर आंखें मूंदे रहे या फिर मिलीभगत के चलते मौन साधे बैठे हैं।
इस निर्माण ने न सिर्फ कानून का उल्लंघन किया है बल्कि इलाके में भीड़भाड़, ट्रैफिक और सुरक्षा का संकट भी खड़ा कर दिया है। इस अवैध इमारत में कोई अग्निशमन व्यवस्था नहीं है, न ही भवन की संरचना की कोई सुरक्षा जांच की गई है। ऐसे में वहां रहने वालों की जान खतरे में है, लेकिन जिम्मेदार एजेंसियां अब तक मौन हैं।
यह घटना केवल एक मंदिर का मामला नहीं है, यह उस मानसिकता की निशानी है जिसमें धर्म, आस्था, कानून और सुरक्षा सभी को बिल्डरों के मुनाफे के लिए कुर्बान किया जा रहा है। यदि ऐसे मामलों पर तुरंत और सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो आने वाले समय में दिल्ली में कोई भी सार्वजनिक या धार्मिक स्थल सुरक्षित नहीं बचेगा।
इस रिपोर्ट के माध्यम से हम दिल्ली नगर निगम, धार्मिक न्यास बोर्ड, दिल्ली सरकार और मुख्यमंत्री कार्यालय से मांग करते हैं कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, मंदिर को तोड़ने के दोषियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाए और अवैध निर्माण को तुरंत ध्वस्त किया जाए। जनता को जवाब चाहिए कि आखिर कब तक बिल्डर राज इस तरह कानून और आस्था दोनों को रौंदता रहेगा?