नई दिल्ली। राजधानी के हृदय स्थल कहा जाने वाले पहाड़ गंज में कानून की धज्जियाँ उड़ती देखना अब एक आम बात हो गई है। यहां अवैध होटल, बार और बोरिंग का जो खेल खुलेआम चल रहा है, वह न सिर्फ दिल्ली की सरकारी मशीनरी पर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह साबित करता है कि प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह से सड़ चुका है। दिल्ली नगर निगम, पुलिस विभाग और स्थानीय प्रशासन की मिलीभगत से यह पूरा रैकेट संरक्षण प्राप्त कर रहा है, और जनता की आँखों के सामने दिल्ली को गर्त में धकेला जा रहा है।जहां देश की राजधानी होने के नाते दिल्ली को आदर्श शहरों की सूची में होना चाहिए था, वहीं पहाड़ गंज जैसे इलाके आज अपराध, अराजकता और भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुके हैं। इन अवैध होटलों में असामाजिक तत्वों का जमावड़ा होता है, और शराब व ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों की आपूर्ति का गढ़ बन चुके हैं। पुलिस प्रशासन और नगर निगम आँख मूंद कर बैठे हैं, और उनकी चुप्पी इस बात का प्रमाण है कि कहीं न कहीं इस गोरखधंधे में उन्हें भी हिस्सा पहुँचता है।ताजा मामला भी मोतिया खान,ए आर पी / सी -2, डबल स्टोरी, कूड़े खत्ते के पास का है,। यहां बिना किसी स्वीकृत योजना (Sanction Plan) के बहु मंजिला फ्लैट्स बना दिए गए हैं । हैरत की बात यह है कि पूरी प्रॉपर्टी के कोई कागजात तक नहीं है, और मल्टी स्टोरी फ्लैट्स बना दिए गए है । – वह भी बिना किसी वैध नक्शे या अनुमति के। यह न सिर्फ दिल्ली मास्टर प्लान का खुला उल्लंघन है बल्कि DMC एक्ट का सीधा मखौल है। ऐसे ही 218, घी मंडी पहाड़ गंज नई दिल्ली में चोरी छिपे अवैध वाटर बोरिंग की गई और अब जो जानकारी मिली उसके अनुसार बिल्डर/भू माफिया द्वारा अवैध निर्माण कर होटल बनाने का काम चल रहा है वो भी बिना किसी सरकारी परमिशन के। यहां तक कि 218 ,घी मंडी पहाड़ गंज के उस अवैध निर्माण और अवैध बोरिंग की सूचना लिखित तौर पर SDM साहब को और MCD बिल्डिंग डिपार्टमेंट करोल बाग जोन को दी गई लेकिन यहां भी आपसी मिलीभगत के चलते कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की गई। पहाड़ गंज में चल रही अवैध बोरिंग पर पहले एसडीएम (राजस्व) ने कुछ कार्यवाही करने की बात कही थी, लेकिन अब वे भी चुप्पी साधे बैठे हैं। आखिर क्यों? क्या उन्हें ऊपर से दबाव है ? या फिर भ्रष्टाचार की चुप्पी ने उन्हें भी इस गंदे खेल का हिस्सा बना दिया है? दिल्ली नगर निगम के करोल बाग जोन के भवन विभाग की भूमिका भी कटघरे में है। ना तो अब तक इस अवैध निर्माण पर कोई चालान कटा है, ना ही किसी प्रकार की नोटिस दी गई है, और ना ही इसे सील किया गया है।जब सत्ता में बैठे लोग ही इस पूरे खेल को संरक्षण दे रहे हों, तो फिर निचली स्तर की प्रशासनिक इकाइयों से उम्मीद ही क्या की जा सकती है ? बिल्डर्स को न कानून का डर है, न अदालतों का। एक पुरानी कहावत है – “जब सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का?” यही हाल आज दिल्ली में देखने को मिल रहा है।इतना ही नहीं, इसी तरह का ताजा मामला मोतिया खान,ए आर पी / सी -2, डबल स्टोरी, कूड़े खत्ते के पास के अलावा भी पहाड़ गंज के शोरा कोठी में अवैध रूप से होटल का निर्माण किया जा रहा है, जहां गली में एक साथ दो आदमी तक नहीं घुस सकते वहां अवैध निर्माण कर होटल बनाए जा रहे हैं या बना दिए गए हैं। ऐसे में अगर कोई हादसा हो तो फायर की गाड़ी तो क्या फायर मेन पैदल भी आग बुझाने गली में घुस नहीं सकते। ऐसे ही कितने फ्लैट्स होटल्स गली चांदी वाली, घी मंडी, मंटोला, संगतराशन एवं पहाड़ गंज के अन्य स्थानों पर बिना किसी वैध दस्तावेज़ या स्वीकृति के अवैध निर्माण कर भवन खड़े किए जा रहे है। लेकिन MCD की नजर इन पर नहीं पड़ती है या फिर आपसी मिलीभगत के चलते MCD बिल्डिंग डिपार्टमेंट करोल बाग जोन इन पर कोई भी कानूनी कार्यवाही करने से कतराती है। यही वजह है कि ऐसे ही पहाड़ गंज में ना जाने कितने ही अवैध रूप से बहु मंजिला फ्लैट्स और अवैध होटल्स बनाए जा रहे हैं।न तो दिल्ली नगर निगम की नींद टूटी, न ही पुलिस ने सवाल उठाया। यह दर्शाता है कि अवैध निर्माण अब एक नया “नया नॉर्मल” बन चुका है – जहां नियम-कायदे सिर्फ आम नागरिकों के लिए हैं, और रसूखदारों के लिए हर नियम तोड़ने की छूट है।दिल्ली की सत्ता अब भाजपा के हाथों में है और नगर निगम भी उनके ही नियंत्रण में है। लेकिन इसके बावजूद इस अवैध साम्राज्य पर अंकुश नहीं लग पा रहा। क्या दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता इस अनियंत्रित भ्रष्टाचार, अवैध निर्माण और कानून के खुले उल्लंघन पर कोई ठोस कदम उठा पाएंगी? या फिर यह भी एक और उदाहरण बन कर रह जाएगा, जहाँ कुछ लोगों की जेबें भरने के लिए एक पूरी राजधानी की साख को दांव पर लगा दिया गया?आज आवश्यकता है सख्त कार्रवाई की, न्यायिक हस्तक्षेप की और इस गंदे खेल में संलिप्त हर व्यक्ति को बेनकाब करने की। यदि अब भी प्रशासन नहीं जागा, तो वो दिन दूर नहीं जब दिल्ली की पहचान ताजमहल या लाल किले से नहीं, बल्कि अवैध होटलों, बारों और बोरिंग के लिए होगी। ये सिर्फ़ एक इलाका नहीं, बल्कि पूरे तंत्र की सड़ांध का आईना है।सवाल यह नहीं है कि ये सब कैसे हो रहा है सवाल यह है कि कब तक यह चलता रहेगा ? और कब तक जनता बेबस तमाशबीन बनी रहेगी ?
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