सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: संज्ञान से पहले आरोपी को सुनना जरूरी

नई दिल्ली: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के प्रावधानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि अब मजिस्ट्रेट के लिए किसी भी अपराध का संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य होगा।

कोर्ट के अनुसार, BNSS की धारा 223 के तहत यह प्रक्रिया आरोपी के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाई गई है। यदि बिना आरोपी को सुने ही संज्ञान (Cognizance) लिया जाता है, तो वह संज्ञान कानून की नजर में अवैध माना जाएगा।

क्या है मामला?

यह टिप्पणी कुशल कुमार अग्रवाल बनाम प्रवर्तन निदेशालय (ED) के मामले में की गई है।
केस: Kushal Kumar Agarwal Vs. Directorate of Enforcement
आपराधिक अपील संख्या: 2749 of 2025
फैसले की तारीख: 09 मई, 2025

माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि BNSS की धारा 223 एक नया और महत्वपूर्ण संरक्षण है, जिसका उद्देश्य निर्दोष लोगों को अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचाना है। मजिस्ट्रेट को शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले यह संतुष्ट होना होगा कि आरोपी को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया गया है।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के बाद PMLA समेत अन्य आपराधिक मामलों में ट्रायल की प्रक्रिया और अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत होगी।

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