कानून को कुचलते बिल्डर, मौन निगम: पहाड़गंज में जमीन पर अवैध कब्जा कर बनाए गए फ्लैट और दुकानें
VIKRM GOSWAMI
नई दिल्ली के मध्य स्थित पहाड़गंज क्षेत्र में बिल्डरों और नगर निगम की मिलीभगत का एक और गंभीर मामला उजागर हुआ है। बाराही माता मंदिर के पास, मकान संख्या 1669/18 में एक बिल्डर द्वारा जमीन पर अवैध कब्जा कर फ्लैट और दुकानें बना दी गई हैं। धार्मिक स्थल के आस-पास इस तरह की अतिक्रमणकारी गतिविधि केवल कानून का उपहास नहीं है, बल्कि सार्वजनिक आस्था और शहरी व्यवस्था के लिए भी सीधा खतरा है। यह मामला दिल्ली में बढ़ते अनियंत्रित निर्माण और भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हो चुकी हैं, इसका स्पष्ट उदाहरण बन चुका है।
स्थानीय नागरिकों के अनुसार यह जमीन सार्वजनिक उपयोग या मंदिर की सीमा में आती थी, जिस पर एक बिल्डर ने धीरे-धीरे कब्जा करना शुरू किया। शुरुआत में अस्थायी निर्माण किया गया और फिर देखते ही देखते वहां पक्की चारदीवारी खड़ी कर दी गई। इसके बाद उस जमीन पर बहुमंजिला इमारत खड़ी कर दी गई, जिसमें अब फ्लैट और दुकानें खुलेआम बेची और किराए पर दी जा रही हैं। यह सब तब हुआ जब इलाके में निगम के अधिकारी नियमित रूप से निरीक्षण के लिए आते हैं। सवाल यह उठता है कि क्या नगर निगम इस पूरी गतिविधि से अनजान था या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?
दिल्ली जैसे महानगर में, जहां एक सामान्य व्यक्ति को घर की मरम्मत कराने से पहले भी अनुमति लेनी होती है, वहां धार्मिक स्थल के पास इस तरह का व्यावसायिक निर्माण कैसे संभव हो सका? क्या इसका सीधा अर्थ यह नहीं है कि बिल्डर ने निगम के कुछ भ्रष्ट अधिकारियों से सांठगांठ कर यह निर्माण कार्य करवाया? और यदि ऐसा नहीं है, तो फिर अब तक इस पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई?
यह मामला केवल जमीन हड़पने और अवैध निर्माण का नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक ताने-बाने पर भी चोट करता है जिसमें धार्मिक स्थलों की पवित्रता का सम्मान किया जाना चाहिए। मंदिर के ठीक समीप इस प्रकार की व्यावसायिक गतिविधियां वहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए असुविधा और सुरक्षा का कारण बनती हैं। दुकानें और फ्लैट न केवल ट्रैफिक और भीड़भाड़ बढ़ा रहे हैं, बल्कि यह इलाका अब अराजकता की ओर बढ़ता जा रहा है।
दिल्ली नगर निगम की चुप्पी इस पूरे मामले को और भी संदिग्ध बनाती है। यदि यह निर्माण अवैध है, तो अब तक इसे सील क्यों नहीं किया गया? संबंधित बिल्डर के खिलाफ एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की गई? और यदि निगम का तर्क है कि उन्हें जानकारी नहीं थी, तो यह उनकी कार्यक्षमता और जवाबदेही पर सीधा प्रश्नचिह्न है। क्या निगम केवल आम नागरिकों पर नियमों की कठोरता दिखाने के लिए है और रसूखदार बिल्डरों के सामने नतमस्तक हो जाना उसकी आदत बन चुकी है?
यह कोई एकमात्र मामला नहीं है। पहाड़गंज, करोल बाग, सदर बाजार जैसे क्षेत्रों में बिल्डर माफिया और प्रशासनिक निकायों की मिलीभगत से सैकड़ों ऐसे निर्माण खड़े किए गए हैं, जिनमें नियमों की कोई परवाह नहीं की गई। स्थानीय निवासी, सामाजिक संगठन और आरटीआई कार्यकर्ता बार-बार इन मामलों को उजागर करते हैं, लेकिन कार्रवाई नाम मात्र की होती है या अदालतों में वर्षों तक अटकी रहती है।
इस समाचार के माध्यम से हम जिम्मेदार एजेंसियों, विशेष रूप से दिल्ली नगर निगम, दिल्ली सरकार और धार्मिक न्यास बोर्ड से यह मांग करते हैं कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और अवैध कब्जा हटाकर दोषियों पर कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए। यदि समय रहते ऐसे मामलों को रोका नहीं गया, तो आने वाले वर्षों में दिल्ली का शहरी ढांचा और प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाएगी। यह सिर्फ एक मोहल्ले की बात नहीं है, बल्कि यह उस कानून व्यवस्था की परीक्षा है जिसे अब भी हम लोकतंत्र का आधार मानते हैं। जनता पूछ रही है — आखिर कब तक नियम केवल आम लोगों पर लागू होंगे और रसूखदारों को छूट मिलती रहेगी?