तरुण कृष्ण शास्त्री
श्री बांके बिहारी मंदिर,निर्णय सिंधु के सिद्धांतों के अनुसार, केवल ‘उदयकालीन पूर्णिमा’ का होना होलिका दहन के लिए पर्याप्त नहीं है।
शास्त्र स्पष्ट रूप से ‘प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा’ (सूर्यास्त के बाद का समय) और ‘भद्रा रहित काल’ को अनिवार्य मानते हैं। 3 मार्च 2026 को लेकर स्थिति इस प्रकार है:
पूर्णिमा तिथि और समय: पूर्णिमा तिथि 3 मार्च 2026 को शाम 05:07 बजे ही समाप्त हो रही है। निर्णय सिंधु के अनुसार, होलिका दहन उसी दिन किया जाना चाहिए जब पूर्णिमा प्रदोष काल (सूर्यास्त के समय) में व्याप्त हो।
प्रदोष काल में प्रतिपदा: 3 मार्च को सूर्यास्त के समय (प्रदोष काल) पूर्णिमा समाप्त होकर ‘प्रतिपदा’ तिथि लग चुकी होगी। चूंकि दहन के समय पूर्णिमा तिथि मौजूद नहीं है, इसलिए शास्त्र इसे मुख्य मुहूर्त नहीं मानते।
चंद्र ग्रहण और सूतक: 3 मार्च को पूर्ण चंद्र ग्रहण (खग्रास) लग रहा है, जिसका सूतक सुबह 06:20 से ही शुरू हो जाएगा। निर्णय सिंधु और धर्म सिंधु के अनुसार, सूतक काल में कोई भी पूजा या मांगलिक कार्य वर्जित होता है।
निर्णय सिंधु का विकल्प: यदि पूर्णिमा प्रदोष काल में न हो या भद्रा/ग्रहण का दोष हो, तो निर्णय सिंधु भद्रा पुच्छ काल या भद्रा समाप्त होने के बाद दहन का सुझाव देती है। इसी कारण 2 मार्च की देर रात (जो तकनीकी रूप से 3 मार्च की सुबह 01:25 AM से 02:35 AM है) को ‘भद्रा पुच्छ’ काल में दहन करना अधिक शास्त्र सम्मत माना जा रहा है।
निष्कर्ष: सिर्फ सूर्योदय के समय पूर्णिमा (उदय व्यापिनी) होने से 3 मार्च की शाम को दहन नहीं किया जा सकता, क्योंकि उस समय तिथि समाप्त हो चुकी होगी और ग्रहण का प्रभाव भी रहेगा।
होलिका दहन के लिए दो समय और विचारणीय रखे गए हैं।
एक प्रातः काल इन 2 तारीख की रात्रि और 3 तारीख की प्रातः 5:00 से 6:15 तक होलिका दहन किया जा सकता है एक समय कुछ लोग पूर्णिमा रहे थे भद्रा रहित प्रतिपदा में संयंकालीन होलिका दहन करने का भी मत दे रहे हैं।
होलिका दहन कब करें ?