सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के हरीश राणा को पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी है। यह देश में पहला ऐसा केस है जहां इच्छा मृत्यु की अनुमति दी गई है. 13 साल से अचेत हरीश राणा की सांसें अभी चल रही हैं, लेकिन वह 2013 से जिंदा लाश की तरह बिस्तर पर हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि उसके ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं है. यह सिर्फ़ दुख को बढ़ाएगा और ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं होगी. पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने उनके घरवालों से बात भी की थी. 100 फीसदी दिव्यांगता के शिकार हो चुके बेटे के ठीक होने की उम्मीद छोड़ चुके हरीश के माता-पिता ने ही उसे इच्छा मृत्य देने की मांग की थी।
बता दे हरीश राणा चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग के छात्र थे. वह न केवल पढ़ाई में तेज थे, बल्कि स्कूल के दिनों से ही उन्हें बॉडीबिल्डिंग का जुनून था. वह अपनी फिटनेस और भविष्य को लेकर काफी गंभीर थे. लेकिन 20 अगस्त 2013 की उस तारीख ने सब कुछ बदल दिया. हरीश अपने पीजी (PG) की चौथी मंजिल से अचानक नीचे गिर गए. इस हादसे में उनके सिर पर गंभीर चोटें आईं, जिसने एक हट्टे-कट्टे नौजवान की जिंदगी को हमेशा के लिए चारदीवारी और बिस्तर तक समेट दिया। हादसे के बाद हरीश के पिता अशोक राणा ने उन्हें बचाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी. चंडीगढ़ PGI से लेकर दिल्ली के AIIMS और देश के कई नामी प्राइवेट अस्पतालों के चक्कर लगाए गए।
डॉक्टरों के मुताबिक, सिर की चोट की वजह से हरीश के दिमाग की नसें सूख चुकी हैं. वह पिछले 13 वर्षों से जिंदा तो है लेकिन अचेत अवस्था में हैं. उनके शरीर में कोई हलचल नहीं है, वे न कुछ महसूस कर सकते हैं और न ही बोल सकते हैं. बस कभी-कभार पलकें झपकना ही उनके जीवित होने का एकमात्र संकेत रहा है।
100 फीसदी दिव्यांगता झेल रहे 31 वर्षीय जवान बेटे की हालत देखकर माता-पिता टूट चुके थे. जब सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बची, तो राणा दंपति ने भारी मन से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अपने बेटे के लिए इच्छा मृत्यु की मांग की।