मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: भोजशाला को मंदिर करार दिया

काफी लंबे समय से चल रहे भोजशाला सरस्वती मंदिर-कमाल मौला मस्जिद विवाद मामले में आखिरकार मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 15 मई, 2026 को अपना फैसला सुना दिया। हाईकोर्ट ने भोजशाला सरस्वती मंदिर को मंदिर करार दिया है। हिंदू पक्ष के वकील विष्णु जैन ने बताया कि कोर्ट ने भोजशाला को मंदिर बताया है। यह फैसला 98 दिन की सुनवाई के बाद आया है।

भोजशाला मामले में विष्णुजैन ने कोर्ट के फैसले पर बताया कि भोजशाला की पूरी इमारत को राजा भोज के द्वारा बनवाया गया है. कोर्ट ने पूजा-पाठ का अधिकार दिया है. अब इस परिसर में सिर्फ पूजा होगी, नमाज की अनुमति नहीं है. कोर्ट ने कहा- ये कमाल औला मस्जिद नहीं है. मुस्लिम समाज सरकार के पास अपनी मांग रख सकते हैं।

इस विवाद की जड़ काफी पुरानी है. हिंदू समुदाय इस जगह को मां वाग्देवी यानी देवी सरस्वती का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे 11वीं सदी की कमाल मौला मस्जिद के रूप में देखता है. वहीं, जैन समुदाय विवादित परिसर में मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल होने का दावा करता है. हालांकि, जैन समुदाय के एक याचिकाकर्ता ने कुछ दिनों पहले ही मामले में याचिका दायर कर अपना दावा किया था. इससे पहले हिंदू और मुस्लिम पक्षों की कोर्ट में सुनवाई चल रही थी. यही वजह है कि यह मामला सालों से चला आ रहा है और अभी तक इसका कोई अंतिम समाधान नहीं निकल पाया।

एएसआई ने हाईकोर्ट के आदेश पर लगभग ढाई साल पहले विवादित परिसर का सर्वेक्षण करके अपनी विस्तृत रिपोर्ट 15 जुलाई 2024 को सौंपी थी. इस दौरान ASI ने भोजशाला परिसर में 98 दिनों तक वैज्ञानिक परीक्षण किया था. कोर्ट ने इस पर दोनों पक्षों से राय मांगी थी. फिर हाईकोर्ट ने 6 अप्रैल से मामले में नियमित सुनवाई पर फैसला किया।

हाईकोर्ट में दायर की गई ASI की सर्वे रिपोर्ट में बताया गया कि मस्जिद मंदिरों के अवशेष से बनी है. इसमें 106 खंभे और 82 प्लास्टर मंदिरों से लिए गए. देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियों के निशान भी मिले. 94 मूर्तियों का भी जिक्र किया गया है. एक बड़े शिलालेख में पारिजातमंजरी नाटिका का उल्लेख है. 12वीं से 20वीं सदी तक के शिलालेखों के प्रमाण मिले।

भोजशाला एएसआई द्वारा संरक्षित है। भोजशाला को लेकर विवाद लंबा है, लेकिन जब विवाद ज्यादा बढ़ा तो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने 7 अप्रैल, 2003 को एक आदेश जारी किया था. इसके अनुसार कहा गया कि हिंदुओं को इस परिसर में प्रत्येक मंगलवार और बसंत पंचमी पर पूजा करने की अनुमति रहेगी, जबकि मुस्लिमों को हर शुक्रवार वहां नमाज अदा करने की इजाजत दी गई थी।

भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद के विवाद ने तब ज्यादा तूल पकड़ लिया था, जब 23 जनवरी के दिन शुक्रवार (जुम्मा) और बसंत पंचमी दोनों एक साथ पड़ गए थे. उस समय मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. दरअसल, हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस (HFJ) की ओर से वकील विष्णु शंकर जैन ने 2 जनवरी को याचिका दायर की थी और मंगलवार को ही सुप्रीम कोर्ट के सामने अर्जेंट सुनवाई के लिए अनुरोध किया था. इसपर कोर्ट गुरुवार (22 जनवरी) को सुनवाई के लिए तैयार हो गया था. तब कोर्ट ने नमाज पढ़ने का समय दोपहर 1 बजे से दोपहर 3 बजे तक रखा था, लेकिन पूजा के लिए कोई समय निर्धारित नहीं किया था. उसके लिए अलग जगह निर्धारित की गई थी।

धार भोजशाला का इतिहास

  • 1034 में राजा भोज ने कराया भोजशाला निर्माण.
  • 1456 में महमूद खिलजी ने भोजशाला को ढहाकर मकबरा बनाया.
  • 1933 में राजा आनंद राव की तबीयत बिगड़ी तो मुस्लिम समाज को नजाम की अनुमति मिली.
  • 1902 में हुए सर्वे में भोजशाला में हिंदू चिन्ह, संस्कृत के शब्द आदि पाए गए, लॉर्ड कर्जन ने रखरखाव के लिए 50 हजार रुपये मंजूर किए.
  • 1951 में भोजशाला को राष्ट्रीय स्मारक घोषित किया गया.
  • 1997 में भोजशाला में आम नागरिकों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया.
  • 2003 में हिंदुओं को मंगलवार और बसंत पंचमी के दिन पूजा और मुस्लिम समाज को शुक्रवार को दोपहर 1-3 बजे नमाज की इजाजत दी गई.

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