वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार निर्भय
नई दिल्ली। दिल्ली में एक के बाद एक सामने आ रही इमारतों से जुड़ी गंभीर घटनाओं ने राजधानी की व्यवस्था, निगरानी तंत्र और जिम्मेदार एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। मुख्यमंत्री की ओर से यह स्पष्ट संदेश दिया गया है कि लापरवाही के लिए किसी को बख्शा नहीं जाएगा, लेकिन मालवीय नगर, मुखर्जी नगर के बाद अब सत्य निकेतन की हृदयविदारक घटना ने इस सवाल को और गंभीर बना दिया है कि केवल घटना के बाद सख्त बयान देने से क्या उन जिंदगियों को वापस लाया जा सकता है, जिन्हें व्यवस्था की कथित लापरवाही ने हमेशा के लिए छीन लिया?
सत्य निकेतन की घटना ने एक बार फिर राजधानी में भवन सुरक्षा व्यवस्था की वास्तविक स्थिति पर बहस छेड़ दी है। सवाल यह नहीं है कि हादसे के बाद कौन अधिकारी मौके पर पहुंचा और किसने जांच के आदेश दिए। असली सवाल यह है कि जब भवन निर्माण से जुड़े कानून और नियम पहले से मौजूद हैं, लाइसेंसिंग की व्यवस्था है, निरीक्षण और कार्रवाई के लिए संबंधित विभाग हैं, तो फिर नियमों के विपरीत निर्माण और संचालन की शिकायतें लगातार सामने क्यों आती रहती हैं?
दिल्ली नगर निगम में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में होने के कारण राजनीतिक जवाबदेही का सवाल भी स्वाभाविक रूप से उठ रहा है। यदि निगम के अधिकार क्षेत्र में आने वाले इलाकों में अवैध या नियमों के विपरीत निर्माण हो रहे हैं, व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं अथवा ऐसी इमारतों का इस्तेमाल लोगों की सुरक्षा की कीमत पर किया जा रहा है, तो फिर निगरानी तंत्र आखिर कर क्या रहा है? क्या संबंधित अधिकारियों को इन निर्माण गतिविधियों की जानकारी नहीं होती या फिर कार्रवाई की प्रक्रिया केवल किसी बड़े हादसे के बाद ही शुरू होती है?
मालवीय नगर और मुखर्जी नगर जैसी घटनाओं ने पहले भी दिल्ली में भवन सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा की थीं। इन घटनाओं के बाद व्यवस्थागत सुधार, निरीक्षण और नियमों के कठोर पालन की बातें सामने आईं। लेकिन यदि उसके बावजूद सत्य निकेतन जैसी हृदयविदारक घटना सामने आती है तो यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि कहीं न कहीं व्यवस्था में ऐसी खामियां हैं, जिन्हें केवल बयानबाजी से दूर नहीं किया जा सकता।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजधानी में सैकड़ों इमारतों के निर्माण और संचालन पर निगरानी रखने के लिए जिम्मेदार विभागों की जवाबदेही कैसे तय होगी। भवन कानून केवल कागजों में दर्ज प्रावधान नहीं हैं। उनका उद्देश्य नागरिकों की जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसी तरह लाइसेंसिंग नियमों का मकसद भी यह सुनिश्चित करना है कि किसी भवन में संचालित गतिविधि निर्धारित सुरक्षा मानकों के अनुरूप हो। यदि नियमों की मौजूदगी के बावजूद असुरक्षित इमारतें चलती रहती हैं तो जिम्मेदारी केवल भवन मालिक तक सीमित नहीं रह सकती। संबंधित विभागीय अधिकारियों की भूमिका और उनकी निगरानी व्यवस्था की भी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
राजनीतिक नेतृत्व से भी यही अपेक्षा है कि हादसे के बाद दोषियों पर कार्रवाई के साथ-साथ उन परिस्थितियों की पड़ताल हो, जिनके कारण कथित तौर पर नियमों का उल्लंघन लंबे समय तक चलता रहा। यदि किसी अधिकारी ने अपनी जिम्मेदारी निभाने में लापरवाही की है तो उसके विरुद्ध भी कार्रवाई होनी चाहिए और यदि किसी स्तर पर मिलीभगत या संरक्षण के आरोप सामने आते हैं तो उनकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
दिल्ली के नागरिकों को आश्वासन से अधिक सुरक्षित व्यवस्था चाहिए। उन्हें यह भरोसा चाहिए कि उनके आसपास मौजूद इमारतें केवल इसलिए नहीं चल रही हैं कि अभी तक कोई हादसा नहीं हुआ। हर इमारत का समय-समय पर निरीक्षण, सुरक्षा मानकों का सत्यापन और नियमों के उल्लंघन पर तत्काल कार्रवाई व्यवस्था का नियमित हिस्सा होना चाहिए।
सत्य निकेतन की घटना ने फिर वही सवाल खड़ा किया है—क्या प्रशासन हर हादसे के बाद जागेगा या हादसा होने से पहले ही अपनी जिम्मेदारी निभाएगा? मुख्यमंत्री का यह कहना कि किसी को बख्शा नहीं जाएगा निश्चित रूप से गंभीर संदेश है, लेकिन जनता अब इस संदेश का परिणाम देखना चाहती है। सवाल राजनीतिक दल से भी है और प्रशासन से भी कि आखिर जवाबदेही कब तय होगी और कब दिल्ली में इमारतों की सुरक्षा को कागजी कार्रवाई के बजाय लोगों की जिंदगी से जोड़कर देखा जाएगा?