प्रतिबंध के बावजूद पहाड़ गंज में कैसे हो रही है बोरिंग ?

विशेष संवाददाता

भूजल दोहन पर उठे गंभीर सवाल, जिम्मेदार एजेंसियों से जवाबदेही की मांग

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में भूजल संकट लगातार गहराता जा रहा है। इसके बावजूद प्रतिबंधित क्षेत्रों में नई बोरिंग कराए जाने के मामले सामने आने से प्रशासनिक व्यवस्था और नियमों के पालन पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गए हैं। विशेष रूप से पहाड़गंज के विभिन्न क्षेत्रों में नई बोरिंग की चर्चाओं ने स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और पर्यावरण विशेषज्ञों के बीच चिंता बढ़ा दी है। सवाल यह उठ रहा है कि जब इन क्षेत्रों में नई बोरिंग पर स्पष्ट प्रतिबंध लागू है, तब आखिर यह कार्य किसकी अनुमति से किया जा रहा है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय के अधीन कार्यरत केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (Central Ground Water Authority-CGWA) ने वर्ष 2020 में जारी अधिसूचना के तहत दिल्ली के सभी 11 राजस्व जिलों को “ओवर-एक्सप्लॉइटेड” (अत्यधिक दोहन वाले) क्षेत्र घोषित किया था। इस श्रेणी में आने वाले क्षेत्रों में भूजल का स्तर अत्यधिक गिर चुका है, जिसके कारण बिना वैधानिक अनुमति के नई बोरिंग या ट्यूबवेल स्थापित करना प्रतिबंधित है। प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों के अनुसार किसी भी नई बोरिंग के लिए CGWA से पूर्व अनुमति (No Objection Certificate-NOC) प्राप्त करना अनिवार्य है। बिना एनओसी के कराई गई बोरिंग अवैध मानी जाती है और उसके विरुद्ध कार्रवाई का प्रावधान भी है।

पहाड़गंज क्षेत्र भी इसी प्रतिबंधित श्रेणी में शामिल है। ऐसे में यदि यहां या इससे जुड़े आर्य नगर क्षेत्र में नई बोरिंग कराई जा रही है, तो यह केवल स्थानीय स्तर का मामला नहीं बल्कि भूजल संरक्षण कानूनों के संभावित उल्लंघन का विषय बन जाता है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जनप्रतिनिधियों या किसी अन्य संस्था द्वारा बोरिंग कराई गई है तो यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि क्या इसके लिए CGWA की वैध अनुमति प्राप्त की गई थी। यदि अनुमति नहीं ली गई, तो संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली में लगातार गिरता भूजल स्तर भविष्य में जल संकट को और गंभीर बना सकता है। इसी कारण केंद्रीय भूजल प्राधिकरण , राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तथा दिल्ली सरकार समय-समय पर वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण और अवैध बोरिंग पर रोक लगाने संबंधी निर्देश जारी करते रहे हैं। इन नियमों का उद्देश्य भूजल संसाधनों का संरक्षण करना है ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए जल उपलब्धता सुनिश्चित की जा सके।
पर्यावरणविदों का कहना है कि यदि प्रतिबंधित क्षेत्रों में प्रभावशाली व्यक्तियों या जनप्रतिनिधियों के माध्यम से नियमों की अनदेखी कर बोरिंग कराई जाती है, तो इससे आम नागरिकों में कानून के प्रति गलत संदेश जाता है। इससे न केवल भूजल संरक्षण के प्रयास कमजोर होते हैं, बल्कि प्रशासन की निष्पक्षता पर भी सवाल उठते हैं।
स्थानीय नागरिकों ने मांग की है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यह सार्वजनिक किया जाए कि संबंधित बोरिंग के लिए किस विभाग ने अनुमति दी, क्या केंद्रीय भूजल प्राधिकरण से एनओसी ली गई थी, तथा यदि नहीं ली गई तो संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध क्या कार्रवाई की जाएगी। नागरिकों का यह भी कहना है कि दिल्ली जैसे जल संकटग्रस्त महानगर में भूजल संरक्षण से जुड़े नियमों का समान रूप से पालन कराया जाना चाहिए, चाहे मामला किसी आम नागरिक का हो या किसी जनप्रतिनिधि का।
जल विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली की बढ़ती आबादी, अनियंत्रित निर्माण और भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण स्थिति पहले ही चिंताजनक बनी हुई है। ऐसे में प्रतिबंधित क्षेत्रों में अवैध बोरिंग को रोकना और कानून का सख्ती से पालन कराना अत्यंत आवश्यक है। यदि नियमों की अनदेखी जारी रही तो आने वाले वर्षों में राजधानी के कई हिस्सों में भूजल स्तर और तेजी से नीचे जा सकता है, जिसका सीधा असर पेयजल उपलब्धता और पर्यावरणीय संतुलन पर पड़ेगा।
अब सभी की निगाहें संबंधित प्रशासनिक एजेंसियों, केंद्रीय भूजल प्राधिकरण, दिल्ली जल बोर्ड और स्थानीय प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रतिबंधित क्षेत्र में कथित बोरिंग के मामले में तथ्यों की जांच कर पारदर्शी कार्रवाई की जाती है या नहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि जल संरक्षण केवल सरकारी नीतियों का विषय नहीं, बल्कि कानून के समान और निष्पक्ष अनुपालन का भी प्रश्न है, क्योंकि भूजल एक साझा प्राकृतिक संसाधन है और इसकी रक्षा सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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