वरिष्ठ पत्रकार अशोक कुमार निर्भय
नई दिल्ली स्थित प्राचीन हनुमान मंदिर एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। देशभर से श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक माने जाने वाले इस ऐतिहासिक मंदिर परिसर में अब भक्तों की धार्मिक स्वतंत्रता, अवैध कब्जों, मनमानी वसूली और प्रशासनिक चुप्पी को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि मंदिर परिसर में प्रभाव रखने वाले एक व्यक्ति विशेष द्वारा ऐसी मुहीम चलाई जा रही है जिससे मंगलवार और शनिवार को पूजा-अर्चना, पाठ और भजन करने आने वाले श्रद्धालुओं को हतोत्साहित किया जाए। इस पूरे मामले ने धार्मिक अधिकारों और सार्वजनिक आस्था पर सीधा हमला होने की बहस छेड़ दी है।
एक निजी समाचार पत्र में प्रकाशित लेख के अनुसार एक व्यक्ति द्वारा दिल्ली पुलिस के पुलिस आयुक्त को पत्र लिखकर मांग की गई है कि मंदिर परिसर में मंगलवार और शनिवार को होने वाले पाठ और धार्मिक गतिविधियों को रोका जाए। इस मांग को लेकर श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों में भारी रोष देखा जा रहा है। लोगों का कहना है कि जिस मंदिर में भक्त वर्षों से हनुमान चालीसा, सुंदरकांड और धार्मिक पाठ करते आए हैं, वहां अब भक्तों को रोकने की कोशिश आखिर किस अधिकार से की जा रही है। सवाल उठ रहा है कि क्या यह सीधे-सीधे धार्मिक आस्था से खिलवाड़ नहीं है।
विवाद केवल यहीं तक सीमित नहीं है। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि जिन लोगों द्वारा भक्तों पर नियम थोपने की कोशिश की जा रही है, वही लोग मंदिर परिसर में कथित रूप से अवैध कब्जा कर कार्यालय चलाए बैठे हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि यह कार्यालय माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों की भावना के विपरीत संचालित हो रहा है। आरोपों के अनुसार मंदिर परिसर का उपयोग निजी प्रभाव और आर्थिक नियंत्रण स्थापित करने के लिए किया जा रहा है। भक्तों का कहना है कि मंदिर किसी व्यक्ति या परिवार की निजी जागीर नहीं बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है, जहां हर व्यक्ति को पूजा करने का समान अधिकार प्राप्त है।
मामले का दूसरा बड़ा पहलू मंदिर परिसर में चल रहे कथित आर्थिक खेल को लेकर सामने आया है। आरोप है कि वर्षों से मंदिर परिसर के बाहर अपने परिवार का पालन-पोषण करने वाले छोटे खोमचे और रेहड़ी-पटरी वालों को हटाने की रणनीति बनाई जा रही है ताकि केवल मंदिर से जुड़ी दुकानों का व्यापार चलता रहे। श्रद्धालुओं का आरोप है कि मंदिर परिसर में कचौड़ी, समोसा और ब्रेड पकोड़ा जैसी सामान्य खाद्य सामग्री 50 रुपये तक में बेची जा रही है, जबकि बाजार में वही सामान 10 से 15 रुपये में आसानी से उपलब्ध है। लोगों का कहना है कि धार्मिक भावनाओं का फायदा उठाकर श्रद्धालुओं की जेब पर डाका डाला जा रहा है।
इसके साथ ही यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि इन खाद्य पदार्थों की बिक्री में न तो जीएसटी का पालन हो रहा है और न ही आयकर या नई दिल्ली नगरपालिका परिषद के नियमों का। सवाल उठ रहे हैं कि यदि मंदिर परिसर में बड़े स्तर पर खाद्य सामग्री का व्यापार हो रहा है तो क्या संबंधित विभागों ने कभी इसकी जांच की। यदि टैक्स नियमों का पालन नहीं हो रहा तो फिर प्रशासनिक कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह पूरा खेल रसूख, प्रभाव और कथित मिलीभगत के दम पर चल रहा है।
श्रद्धालुओं का कहना है कि कुछ प्रभावशाली लोगों के साथ फोटो खिंचवाकर सार्वजनिक करना और खुद को मंदिर का सर्वेसर्वा बताना कानून से ऊपर होने का प्रमाण नहीं हो सकता। मंदिर परिसर में आने वाले भक्तों पर कथित “शासन” चलाने की मानसिकता को लेकर भी नाराजगी बढ़ रही है। लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि मंदिर परिसर में अवैध कब्जों, महंगी बिक्री, टैक्स चोरी और भक्तों के धार्मिक अधिकारों में हस्तक्षेप के आरोपों की निष्पक्ष जांच कर कठोर कानूनी कार्रवाई की जाए। श्रद्धालुओं का स्पष्ट कहना है कि पूजा का अधिकार सबका है और किसी भी व्यक्ति को आस्था पर पहरा लगाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। “जय बजरंग बली” के उद्घोष के साथ भक्तों ने प्रशासन से जवाब मांगा है कि आखिर कब तक धार्मिक स्थलों की आड़ में मनमानी चलती रहेगी।