विशेष संवाददाता मणि आर्य/ अशोक कुमार निर्भय
नई दिल्ली। फर्जी और स्वयंभू यूट्यूबर पत्रकारों को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने गहरी चिंता जाहिर की है। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि ऐसे लोगों पर रोक लगाने के लिए सख्त कानून बनाया जाए।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि आज के दौर में मोबाइल फोन हाथ में लेकर कोई भी खुद को पत्रकार घोषित कर देता है, जबकि उसके पास न तो पत्रकारिता का कोई प्रशिक्षण होता है, न नैतिक आधार और न ही किसी प्रकार की जवाबदेही।
कोर्ट ने कहा कि ऐसे स्वयंभू रिपोर्टर खबर बनाने के दौरान लोगों से कई बार आक्रामक तरीके से सवाल पूछते हैं और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर इस तरह पेश करते हैं, जिससे समाज में भ्रामक माहौल बनता है।
अदालत ने चेतावनी दी कि चुनिंदा रिपोर्टिंग, सनसनी फैलाने और बिना सत्यापन के आरोप प्रकाशित करने से सामाजिक विभाजन बढ़ सकता है, सांप्रदायिक तनाव पैदा हो सकता है और कानून-व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हो सकती है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आधार है और इसकी पूरी तरह रक्षा होनी चाहिए, लेकिन इसे गैर-जिम्मेदार पत्रकारिता, डराने-धमकाने या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली सामग्री प्रसारित करने का संरक्षण नहीं बनाया जा सकता।
विश्व पत्रकार महासंघ ने किया स्वागत, सख्त कानून की मांग
दिल्ली हाईकोर्ट की इस टिप्पणी का विश्व पत्रकार महासंघ ने स्वागत किया है। महासंघ ने कहा है कि वह लंबे समय से ऐसे फर्जी यूट्यूबर और स्वयंभू पत्रकारों का विरोध करता आ रहा है, जो बिना प्रेस कार्ड, बिना प्रशिक्षण और बिना किसी संपादकीय जवाबदेही के खुद को पत्रकार बताकर वसूली, ब्लैकमेलिंग और समाज में नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं।
विश्व पत्रकार महासंघ ने सरकार से मांग की है कि इस मामले में जल्द से जल्द सख्त कानून बनाया जाए, ताकि असली और प्रशिक्षित पत्रकारों की साख बची रहे और प्रेस की गरिमा कायम रह सके।