31 साल पुराने 1 करोड़ की फिरौती के लिए अपहरण कांड का आरोपी, अंतरिम जमानत पर छूटकर हो गया था फरार आरोपी।
नई दिल्ली, 17 अगस्त 2026
दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने 31 साल पुराने सनसनीखेज अपहरण कांड में उम्रकैद की सजा काट रहे भगोड़े अपराधी को गिरफ्तार करने में बड़ी सफलता हासिल की है। आरोपी पिछले 26 साल से कानून को चकमा देकर फरार चल रहा था।
ARSC टीम ने देहरादून में दबोचा
स्पेशल सीपी क्राइम एच.जी.एस. धालीवाल के अनुसार, ARSC, क्राइम ब्रांच की टीम ने 57 वर्षीय आरोपी अमित यादव पुत्र राम ऋछपाल सिंह को 13 अगस्त की रात देहरादून, उत्तराखंड से गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई इंस्पेक्टर रॉबिन त्यागी के नेतृत्व में ACP संजय नागपाल और DCP संजीव कुमार यादव की देखरेख में की गई।
आरोपी थाना पटेल नगर के FIR No. 716/1995, धारा 364A/368/394/506/323/201/34 IPC में वांछित था।
क्या था मामला?
- 12 सितंबर 1995 को शाम 7 बजे ऋषि सेठी अपनी कार में AIIMS के डायरेक्टर के घर के पास बैठे थे, तभी 3-4 बदमाशों ने उन्हें जबरन पीटा, आंखों पर पट्टी बांधी और उनकी ही कार में अगवा कर लिया।
- आरोपियों ने परिवार से 1 करोड़ रुपये की फिरौती मांगी।
- पुलिस के जाल के तहत 10 लाख रुपये मेरठ के होटल मयूर के कमरा नंबर 221 में रखवाए गए। 16 सितंबर 1995 को जब आरोपी अमित यादव पैसे लेने पहुंचा तो पुलिस ने उसे रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया और 10 लाख रुपये बरामद किए।
- उसकी निशानदेही पर गाजियाबाद के राज नगर स्थित किराए के मकान नंबर R-63, राज कुंज से पीड़ित ऋषि सेठी को जंजीरों में जकड़ा हुआ बरामद कर सुरक्षित छुड़ाया गया।
कोर्ट ने 25 अगस्त 1999 को आरोपी को उम्रकैद और 2.50 लाख रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।
जमानत पर छूटा और 26 साल तक रहा फरार
आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील Crl. Appeal No. 569/1999 दायर की। 15 जनवरी 2000 को हाईकोर्ट ने उसे एक महीने की अंतरिम जमानत दी, लेकिन वह सरेंडर करने के बजाय फरार हो गया। 13 दिसंबर 2000 को हाईकोर्ट ने उसकी अपील खारिज कर सजा बरकरार रखी। उसके बाद वर्ष 2000 में ही उस पर 5,000 रुपये का इनाम घोषित किया गया और उसे भगोड़ा घोषित कर दिया गया।
बिना फोटो के ऐसे पकड़ा गया शातिर
क्राइम ब्रांच के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि 30 साल पुराने केस में आरोपी की कोई फोटो ही रिकॉर्ड में नहीं थी। न जेल के पास, न दिल्ली पुलिस के पास। तब क्राइम रिकॉर्ड ऑफिस और फिंगर प्रिंट ब्यूरो की मदद ली गई। फिंगर प्रिंट ब्यूरो के डायरेक्टर सुभाष चंदर और इंस्पेक्टर ब्रह्म प्रकाश की मदद से 1999 में सजा के समय लिए गए उसके बायोमेट्रिक रिकॉर्ड को ढूंढा गया, जिसके बाद उसकी पहचान पुख्ता हुई।
पूछताछ में आरोपी ने बताया कि फरार होने के बाद उसने गाजियाबाद का घर खाली कर दिया और बागपत के सैदपुर गांव में अपनी सारी पुश्तैनी जमीन बेच दी। पहले वह ऋषिकेश में छिपा रहा, फिर 2001 में देहरादून शिफ्ट हो गया। वहां उसने अपनी पहचान बदल ली और बिल्डर के तौर पर कंस्ट्रक्शन का काम शुरू कर दिया।
फिलहाल आरोपी को तिहाड़ जेल में भेज दिया गया है।